आहिर रेजिमेंट : जानिए पूरा तथ्य

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ગઈ કાલે આહીર રેજીમેન્ટ માટે આહીર સમાજે GMDC ગ્રાઉન્ડ ખાતે સભા બોલાવી હતી. જેમાં મોટી સંખ્યામાં સમગ્ર રાજ્યમાંથી આહીર સમાજના પ્રતિનિધિઓ અને લોકો ભેગા થયા હતા. આહીર સમાજની માંગ શું છે? કેટલી વ્યાજબી છે? ક્યાં અન્યાય થઈ રહ્યાની લાગણી થઈ રહી છે એ બધું જ આર્ટીકલમાં આવરી લીધું છે. સૌ યુવાનોએ વાંચવા જેવો રસપ્રદ આર્ટીકલ.

यादव/अहीर रेजिमेंट एक ऐतिहासिक ज़रूरत :
पिछले 125 वर्षों से अहीर/यादव रेजिमेंट का न होना ,समस्त यादव समाज के सामने एक यक्ष-प्रश्न के रूप में रहा है | यादव/अहीर रेजिमेंट की माँग को सही परिपेक्ष्य में समझने के लिए ऐतिहासिक घटनाओं एवं दुर्घटनाओं का ज्ञान होना बहुत ज़रूरी है | यादव समाज के नेताओं और बुद्धिजीवियों को इस बात का एहसास होना जरुरी है कि सही ऐतिहासिक तथ्यों की जानकारी की बदौलत ही हमें यादव-समाज के साथ हुए इस ऐतिहासिक अन्याय के बारे में जानकारी मिलेगी :

ahir rejiment 51. आप को ये जान कर अति हैरानी होगी कि ईस्ट इंडिया कम्पनी के राज़ में उनकी फौज में ब्राह्मण,अहीर और मुस्लिम बहुतायत में थे तथा आज जिन जातियों के नाम से रेजिमेंट हैं, उस दौर में उन जातियों की कम्पनी की सेना में उपस्थिति नगण्य था |
1857 में हुए विद्रोह में अहीर सैनिकों ने सूबेदार भोंदू सिंह के नेतृत्व में कानपुर में बगावत का झंडा बुलन्द किया और सूबेदार भोंदू सिंह जी लड़ते हुए आजमगढ़ में शहादत को प्राप्त हुए | इसी कड़ी में इटावा-मैनपुरी के अहीर सरदार चौधरी रामरतन सिंह जी और भगवान् सिंह जी ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया और अपनी शहादत दी |
उधर हरियाणा में अहीरवाल क्षेत्र में यादव नरेश राव तुलाराम,राव गोपालदेव और राव किशन सिंह जी ने इस गदर में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया और नसीबपुर(नारनौल) के ऐतिहासिक युद्ध में करीब 5 हजार यादव-वाहिनी ने राव किशन सिंह जी के साथ शहादत हासिल करी |

2. 1892 का सैन्य-पुनर्गठन :
1857 का गदर समाप्त होने के बाद इंग्लैंड की रानी के राज़ का आगाज़ हुआ और अंग्रेजों ने बाटों और राज़ करो कि नीति के तहत भारतीय सेना का पुनर्गठन 1892 में किया | इस पुनर्गठन की निम्न विशेषताएं थीं –
(I) ये पुनर्गठन रॉयल इस लॉयल के की नीति के आधार पर था| इस पुनर्गठन में सिर्फ उन जातियों को तरज़ीह दी गयी जिन ने 1857 के गदर में अंग्रेजों का खुल कर साथ दिया था और उनको हिंदुस्तान जीतने में मदद करी थी|
(II) अंग्रेजों ने एक सोची-समझी साज़िश के तहत एक ऐसी जाति-आधारित फौज का गठन किया जिसकी वफादारी सिर्फ अंग्रेजों और स्वयं की जाति के प्रति थी न कि राष्ट्र के प्रति|

3. प्रथम विश्व-युद्ध :
मेजर AH बिंगले के अनुसार 1914-18 के प्रथम विश्व-युद्ध के दौरान करीब 20 हजार अहीर सैनिक अहीरवाल क्षेत्र से भर्ती हुए| जनसँख्या व् कार्यरत सैनिकों के अनुपात में समस्त भारत में अहीर अव्वल थे| अहीर सैनिकों ने पूर्वी अफ्रीका ,मेसोपोटामिया ,काला सागर आदि के मोर्चों पर अपनी वीरता और सैन्य-गुणों का लोहा सारे संसार में मनवाया|

4. द्वितीय विश्व-युद्ध :
1940-44 के युद्ध के दौरान करेब 39 हजार अहीर सैनिकों ने भर्ती हो कर अपनी सैनिक परम्परा को आगे बढ़ाया| उन्होंने ने कलादान घाटी,बर्मा ,सिंगापुर आदि के मोर्चों पर अपने पराक्रम को प्रदर्शित किया और वीरता के अनेकों पदक जीते जिनमे एक विक्टोरिया क्रॉस भी शामिल है|
यहाँ ये बात भी उल्लेखनीय है कि नेताजी सुभाषचंद्र बोस की आज़ाद हिन्द फौज में अहीर सैनिकों की बहुत भारी तादाद थी और उनका एक ऐतिहासिक योगदान था|

5. आज़ादी के बाद का षड्यंत्र :
(I) 1947 में विभाजन के बाद भारतीय सेना में उस समय में कार्यरत पंजाबी मुसलमानों के पाकिस्तान जाने पर खाली हुए स्थान को कुछ जातियों ने हडप लिया| अहीरों कि हिस्सेदारी इस नई सेना में कम कर दी गयी
(II) तत्कालीन थल-सेनाध्यक्ष जनरल करिअप्पा ने कहा कि सेना में जातिवादी व्यवस्था को खत्म किया जायेगा और काबिलियत के आधार पर भर्ती होंगी
(III) लेकिन इन अँगरेज़-परस्त जातियों के दबाब में जनरल करिअप्पा के आदेशों की पालना न हुई और जातिगत रेजिमेंट बरकरार रही| लेकिन साथ में ये कहा गया कि अब जातीय/क्षेत्रीय आधार पर कोई नई रेजिमेंट का गठन नहीं किया जायेगा| सरकार की इस व्यवस्था का इन जातियों ने धूर्तता-पूर्वक उल्टा फायदा उठाया और इन ही जातिगत रेजिमेंटों में जातीय-आधार पर भर्तियों को ज़ारी रखा| इसके परिणाम-स्वरुप भारतीय फौज में इन ही जातियों का पूर्ण रूप से आधिपत्य हो गया और अन्य जातियाँ जो अंग्रेजों के खिलाफ थी ,उन जातियों की हिस्सेदारी को नगण्य कर दिया गया|
(IV) इस आदेश से सरकार की मंशा तो ये थी कि आजादी के बाद धर्म/क्षेत्र/जातीय आधार पर होने वाली भर्तियों को बंद करना और सब को बराबर का हिस्सा देना ,लेकिन एक कुचक्र के तहत उल्टा हो गया और मुट्ठी-भर जातियों का फौज में वर्चस्व हो गया
(V) यहाँ ये बात भी गौर देने लायक है कि आजादी के समय भारतीय सेना की नफरी करीब 2.5 लाख थी जब कि आज ये नफरी करीब 12.5 लाख है| भारतीय सेना के इस महत्वपूर्ण विस्तार में इन्हीं अँगरेज़-परस्त जातियों ने खूब जम कर मलाई खायी और अपनी हिस्सेदारी को एक सुनियोजित ढंग से ये बढ़ाते रहे| इस कुचक्र के तथ्य को राष्ट्र से छुपाया गया और सेना के नाम की दुहाई दे कर अन्य लडाकू जातियों के साथ अन्याय ज़ारी रखा गया|

6. फौज में भर्ती की प्रक्रिया –
भारतीय सेना में करीब 12.5 लाख सैनिक हैं जिनमें से करीब 70% भर्तियाँ जाति/धर्म/क्षेत्र के आधार पर होती हैं| इस व्यवस्था से 70% भारतीयों को सेना में भर्ती के लिए अयोग्य करार कर दिया जाता है| भारतीय सेना की ये नीति न केवल गैर-कानूनी है ,गैर-संविधानिक है, बल्कि नस्ल-भेदी भी है|

7. वर्तमान व्यवस्था में अहीर सैनिकों की स्थिति –
(I) इन्फेंट्री —
— कुल इन्फेंट्री रेजिमेंट – 29
— प्रत्येक रेजिमेंट में करीब 25-30 हजार सैनिक
— अहीरों की संख्या एक इन्फेंट्री रेजिमेंट में सिर्फ 22%
(II) आर्म्ड कोर –
— कुल टुकडियां –60-70
— प्रत्येक टुकड़ी में करीब 500-550 सैनिक
— अहीर सिर्फ दो टुकड़ियों में 25%
(III) ग्रेनेडियर्स –
— कुल बटालियन करीब 25-30
— प्रत्येक बटालियन में करीब 1000 सैनिक
— अहीर सिर्फ दो बटालियनों में 25-25%
(IV) तोपखाना –
— कुल टुकडियां करीब 190
— प्रत्येक टुकड़ी में करीब 500 सैनिक
— अहीर की हिस्सेदारी करीब 6-8%
यहाँ ये बात उल्लेखनीय है कि इतनी सीमित संख्या में UP, बिहार,MP , हरियाणा ,दिल्ली, गुजरात ,बंगाल राजस्थान आदि सभी प्रदेशों के यादव आ जाते हैं| इतनी विशाल यादव आबादी के सामने ये हिस्सेदारी नगण्य है|

8. यादव सदा से “हल और हथियार” वाली कौम रही है| हल तो अब ज़मीने बटने के साथ खत्म हो गया है लेकिन हथियार से तो हम से एक षड्यंत्र के तहत छिना गया है|

9. अहीर रेजिमेंट अब तक नहीं बनने का कारण –
(I) 1857 की क्रांति में अहीर सरदारों व सैनिकों ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जिसके वजह से अंग्रेज-सत्ता ने इनको अपना दुश्मन माना
(II) 1940 में देश-प्रेम की भावना के आवेश में अहीर सैनिकों द्वारा अंग्रेजों के खिलाफ सिंगापुर में विद्रोह कर दिया गया और भारी-संख्या में अहीर सैनिकों ने आज़ाद हिन्द फौज में शामिल हो कर अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध लड़ा
(III) यादव समाज के नेताओं द्वारा रेजिमेंट के मुद्दे का सही आकलन न करना तथा मुद्दे के प्रति उदासीनता बरतना| यादव समाज के नेताओं की अकर्मण्यता, अज्ञानता और भीरु नेतृत्व की वजह से अहीर रेजिमेंट न बन पायी
(IV) आम अहीर द्वारा भी इस मुद्दे को सही परिपेक्ष्य में नहीं समझना तथा अपने इज्ज़त और इकबाल के प्रति उदासीन रवैया रखना

10. अहीर सैनिकों के द्वारा लड़े गये ऐतिहासिक युद्धों की सूची –
प्रथम विश्व-युद्ध —पूर्वी अफ्रीका, मेसोपोटामिया, काला सागर
द्वितीय विश्व-युद्ध –बर्मा, कलादान, कोहिमा सिंगापुर
1948 बड़गाम
1961 गोवा लिबरेशन
1962 रेजांगला
1965 हाजी पीर
1967 नाथू ला
1971 जैसलमेर
1984 ऑपरेशन मेघदूत –सियाचिन का मोर्चा
1987 श्रीलंका
1999 टाइगर हिल-कारगिल
2001 संसद भवन हमला
अक्षरधाम हमला
26/11 मुंबई हमला

11. अहीर सैनिकों द्वारा प्राप्त वीरता पदक –
1947 से पहले के पदक —
(i) विक्टोरिया क्रॉस – 1
(ii) जॉर्ज क्रॉस – 2
(iii) मिलिट्री क्रॉस – 3
(iv)|OM – 3
(v)|DSM – 7
1947 के बाद के वीरता पदक –
परमवीर चक्र – 1
अशोक चक्र – 3
महावीर चक्र – 3
वीर चक्र – 29
कीर्ति चक्र – 1
शौर्य चक्र – 7
आज़ाद हिन्द फौज के वीरता पदक – 5
“शूरवीरों में अति शूरवीर – वीर अहीर” का ख़िताब 13 कुमाँऊ अहीर पलटन को
यहाँ ये बात अति महत्वपूर्ण है कि बहुत ही सीमित प्रतिनिधित्व होने के बावजूद भी अहीर सैनिकों ने हर युद्ध में हिस्सा लेते हुए बहुतायत में वीरता-पदक हासिल किये| अगर सेना में प्रतिनिधित्व व वीरता के आयाम का अनुपात लगाया जाये तो आज भी अहीर सबसे अव्वल हैं|

12. अहीर सैनिकों के बारे में विभिन्न सैन्य-अफसरों की राय –
(i) जनरल थिम्मय्या की पहली पोस्टिंग अहीर कंपनी में हुई और ये नाता उम्र भर रहा| थिम्म्य्या अपने प्यारे अहीरों के लिए लिखते हैं —
“यदुवंशी अहीर सीधे-साधे गाँव-देहात के लोग थे और उनमे कोई ऐब नहीं था| वो शराब से दूर रहते हैं और निहायत ही ईमानदार लोग हैं| वे पैसा फ़ालतू में बरबाद नहीं करते थे और सारे पैसे अपने परिवार के लिए गाँव में भेजते थे| वे लम्बे,सुते हुए बदन के मेहनती और मज़बूत लोग हैं , 30-40 किलोमीटर का मरुस्थल में मार्च उनके लिए कुछ भी नहीं है| उनमें बड़ा भाईचारा है और वो एक साथ बैठ कर गीत गाते हैं और हंसी-मजाक करते हैं| ये कभी कायदा नहीं तोड़ते और बड़े बहादुर और वफादार हैं| मुझे उनके साथ होने पर फक्र है और मुझे इनसे बेहद लगाव हो गया है “|
(ii) जनरल कुंवर बहादुर सिंह –
“वीर अहीरों ने अपने से कई गुणा चीनियों को मार गिराया था, ऐसा उदहारण किन्हीं अन्य युद्ध-गाथाओं में नहीं मिलता “

कुमाँऊ रेजिमेंट का सच – वीर अहीरों के साथ अन्याय की पराकाष्ठा :
ये ऐतिहासिक तथ्य और सत्य है कि आज की कुमाँऊ रेजिमेंट का जन्म हैदराबाद रेजिमेंट में से हुआ है| 1897 में हैदराबाद contigent की 6 इन्फेंट्री बटालियनों में सिर्फ दक्खिनी मुस्लिम,हिन्दुस्तानी मुस्लिम,अहीर,जाट,राजपूत ही शामिल थे| इनमें से 2 और 5वीं बटालियनों में अहीरों की हिस्सेदारी 25% थी| 1902 में 2 इन्फेंट्री बटालियन का नाम 95 रुस्सेल इन्फेंट्री और 5 वि बटालियन का नामकरण 98 इन्फेंट्री हुआ और दोनों में अहीरों की हिस्सेदारी 25% थी| 1 दिसम्बर 1922 को सेना के पुनर्गठन में इन यूनिट्स को 19 हैदराबाद रेजिमेंट नाम दिया गया| 1923 में हैदराबाद रेजिमेंट में कुमाँऊनियों का प्रवेश हुआ और 1930 में हैदराबाद रेजिमेंट में अहीर,जाट,कुमाँऊनि हिस्सेदारी बराबर की 33% थीं| 27 अक्तूबर 1945 में हैदराबाद रेजिमेंट का नाम बदल कर 19 कुमाँऊ कर दिया गया और अहीरों की हिस्सेदारी घटा कर 25% कर दी गयी,जाट निकाल कर जाट व् ग्रेनेडियर्स में भेज दिए गये और कुमाँऊनियों की हिस्सेदारी 75% कर दी गयी.

कुमाँऊनिकरण के नाम पर अहीरों के सैनिक इतिहास को नष्ट करने का एक सुनियोजित षड्यंत्र 1945 से आज तक ज़ारी है| अहीरों की सैन्य-उपलब्धियों को इतिहास में कुमाँऊनिकरण की आड़ में सदा छुपाया गया और कुमाँऊनी उपलब्धियों के रूप में ही इतिहास के पन्नों में दर्शाया गया| रण-खेतों में अहीर खून बहता रहा लेकिन नाम नहीं मिला| इसी साज़िश के तहत 13 व 11 विशुद्ध अहीर बटालियनों को तोड़ने की भी कोशिश करी गयी लेकिन कुछ सजग कौमी-अहीरों के विरोध के चलते ये षड्यंत्र विफल रहा| सैनिक इतिहास/परम्परा की दुहाई दे कर मध्यकालीन कबीले-वादी परम्परा को चलाया जा रहा है और हमारे सैनिक इतिहास को जलाया जा रहा है| क्या अहीर दोयम दर्जे के नागरिक हैं ? क्या अहीर सैनिक दोयम दर्जे का सैनिक है ? क्या कुछ जातियों की रेजिमेंट होने से देश गौरवान्वित होता है ? क्या अहीर रेजिमेंट बनने से देश शर्मसार होता है ? जब ये जातियां अपने सैनिक इतिहास पर गर्व कर सकती हैं तो वीर अहीरों को अपने सैनिक इतिहास पर गर्व करने का हक़ क्यों नहीं है ? कब तक वीर अहीरों की कुर्बानी व शहादत का शोषण होता रहेगा ? यादव-समाज कब तक इस अपमान को सहता रहेगा ? ये कैसी विडम्बना है कि भारतीय सेना के पास अपना कोई लिखित भर्ती नियमावली/कानून नहीं है| वो कौन से जातिवादी शक्तियां हैं जो अहीर सैनिक इतिहास व् परम्परा को धीरे-धीरे नष्ट करने का संगठित कुचक्र चला रही हैं ? आधुनिकीकरण/re-ऑर्गनाइजेशन के नाम पर अहीर पलटनों के साथ हमेशा छेड़-छाड़ क्यों होती है और दूसरी जातियों को इस आड़ में क्यों मजबूती प्रदान करी जाती रही है ? यादव-समाज की एक ही मांग है –क्या तो सब की रेजिमेंट तोड़ दो या फिर अहीरों की जोड़ दो|

B. N. Ahir

ashok bhavanbhai sisara ahir regimentArticle sent by Ashok Bhavaanbhai Sisara

Sharuaat

સેંકડો યુવાનો છે જે ખરેખર પરિવર્તનનું કામ કરી રહ્યા છે અથવા તો આ વ્યવસ્થાને બદલવા રસ્તો શોધી રહ્યા છે. આવા યુવાદીપકો થકી બીજા યુવાઓને જગાડવા છે, ભ્રષ્ટ વ્યવસ્થા સામે લડતા કરવા છે. સાથે સાથે જે યુવાનોને યોગ્ય પ્લેટફોર્મ નથી મળી રહ્યું તેમને પણ મદદ કરવી એવો અમારો આશય છે. રાજકીય, સામાજિક, કળા, સાહિત્ય, IT, સોસીઅલ મીડિયા, વિજ્ઞાન, સંશોધન, વિગેરે એમ દરેક ક્ષેત્રમાં, યુવાનો માટે જે અગણિત સંભાવનાઓ છુપાયેલી છે, એ તેમને આ મેગેઝીનના માધ્યમથી તેમના હાથની હથેળી સુધી પહોંચાડવી છે. આ આર્ટીકલ વિષે તમારા પ્રતિભાવો કોમેન્ટમાં જરૂરથી લખજો. જય ભારત યુવા ભારત યુવાશક્તિ ઝીંદાબાદ કૌશિક પરમાર સંપાદક ૮૧૪૧૧૯૧૩૧૧

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1 Response

  1. Devshi Baria says:

    આહીર સમાજ દ્વારા આવેલો બદલાવ ભારતદેશમા જાતીપ્રથા કેટલી ભયંકર માનસિકતા ધરાવે છે અને તેના મુળ કેટલા ઊંડા છે તેને ઉજાગર કરે છે.કપટી અને સ્વાર્થી વિરુદ્ધ ભોળા પ્રમાણીક અને વફાદાર વચ્ચે જંગ ખુલ્લેઆમ જગજાહેર થવો જોઇએ.સૌએ મળીને નકલી રાષ્ટ્રવાદ ને પ્રમાણીક પણે સમાપ્ત કરવો જોઈએ.

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